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Kishan Nishadleft a comment
लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर रात के 3 बजे का सन्नाटा पसरा हुआ था. आखिरी ट्रेन जा चुकी थी और अब सिर्फ इक्का-दुक्का लोग ही प्लेटफॉर्म पर बचे थे, अपनी अगली ट्रेन का इंतज़ार करते हुए. मैं, राहुल, भी वहीं था, कानपुर जाने वाली सुबह की पहली ट्रेन पकड़ने के लिए. ठंड बढ़ रही थी और हवा में एक अजीब-सी सिहरन थी. तभी मेरी नज़र प्लेटफॉर्म के दूसरे छोर पर पड़ी. एक बुजुर्ग औरत बैठी थी, बिल्कुल अकेली. उसने एक...
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